महराज जरासंध की कहानी 🥇Jarasandh जन्म और मृत्यु का सत्य🥇

महराज जरासंध की कहानी| जरासंध वध (Jarasandh Vadh)

मानो या न मानो परन्तु महाभारत कहानी है चंद्रवंशी रवानी राजाओ और क्षत्रियो की।

जरासंध, चंद्रवंशी और महाभारत इतिहास के पन्नो पर आपको इर्द गिर्द घूमता हुआ नजर आएगा. बात है पुराणी परन्तु है हमारी | हमारी संस्कृति , हमारी पहचान |

यहाँ तक की कौरव और पांडव भी चंद्रवंशी थे| प्राचीन भारतीय महाकाव्य महाभारत में चंद्रवंशी राजाओं की वंशावली मिलती है।

चंद्रवंशी खुद में एक इतिहास है जिसे मिटाने में किनते राजाओ ने कोशिश की मगर अंतः बिफलता ही प्राप्त हुए|

चन्द्रवंश का हरेक चंद्रवंशी अपने आप में महान और शूरवीर होता है, एक महँ योद्धा होता है |

सत्य के लिए जान दे भी सकता है जान ले भी सकता है |

चंद्रवंशी का इतिहास रहा है वो कभी रणभूमि छोर कर नहीं भागे और इतिहास ये भी कहता – भगवन कृष्णा चनद्रवंशी राजा जरासंध (Raja Jarasandh) के दर से द्वारका भाग कर रहने लगे थे |

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(Jarasandh) जरासंध कौन था?

प्राचीन भारतीय महाकाव्य महाभारत व पुराणों से मालूम चलता है कि महराज जरासंध मगध का एक बहुत शक्तिशाली सेनापति थे और बाद में वो एक महान मगध सम्राट बने जिसको हराना नामुक़ीम था|

वो मगध के बारहद्रथ वंश के संस्थापक राजा बृहद्रथ का वंशज था।

मगध महाराज जरासंध (Raja Jarasandh) भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त थे और कितनो सालो तक वो शिव की भक्ति में लीन रहे|

मगध महाराज जरासंध मथुरा के राजा कंस का ससुर एवं परम मित्र थे और वो अपने दोनों पुत्रियों आसित व प्रापित का विवाह राजा कंस से करवाया था |

Jarasandh ki photo
Jarasandh ki photo

(Raja Jarasandh) जरासंध का जन्म और जरासंध किसका पुत्र था?

बृहद्रथ मगधदेश के राजा थे और उनकी दो पत्नियां थीं, लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी और वो इसी कारन से दुखी रहा करते थे ।

एक दिन संतान की चाह में राजा बृहद्रथ महात्मा चण्डकौशिक के पास गए, उनकी आराधना किया, उनकी भक्ति में लीन रहे और सेवा कर उन्हें संतुष्ट किया।

भक्ति और आराधना देख कर प्रसन्न हुआ |

महात्मा चण्डकौशिक ने उन्हें एक फल दिया और कहा कि ये फल अपनी पत्नी को खिला देना, इससे तुम्हें संतान की प्राप्ति बहुत जल्द होगी गी।राजा बृहद्रथ की दो बहुत ही सुन्दर पत्नियां थीं।

महराजा ने वह फल काटकर दो टुकड़ो में अपनी दोनों पत्नियों को खिला दिया।

थोड़ी समय गुजरने पर दोनों रानियों के गर्भ से शिशु के शरीर का एक-एक टुकड़ा पैदा किया ।

रानियों बिचित्र घटना देख कर घबरा गये और रानियों ने घबराकर शिशु के दोनों जीवित टुकड़ों को बाहर जार कर कही दूर फेंक दिया।

उसी समय वहां से एक जंगली राक्षसी गुजरी और उसका नाम जरा था।

जब उसने जीवित शिशु के दो टुकड़ों को देखा तो बहुत दुखी हुए |

उसने जल्दी से अपनी गोद में रख ली | राक्षसी दिल से बहुत अच्छी थी और माया से उन दोनों टुकड़ों को जोड़ दिया और वह शिशु एक हो गया। शिशु को एक जीवन की प्राप्ति हुए |

एक शरीर होते ही वह शिशु जोर-जोर से रोने लगा और अपनी माँ का गुहार लगाने लगा |

बालक की रोने की आवाज सुनकर दोनों रानियां बाहर निकली और उन्होंने उस बालक को गोद में ले लिया और प्यार करने लगी ।

उसी समय राजा बृहद्रथ भी वहां आ गए और राक्षसी को देख कर बहुत प्रश्न हुआ |

उन्होंने उस राक्षसी से उसका परिचय पूछा।

राक्षसी ने राजा को सारी बात सच-सच बता दी और ये सुन कर राजा बहुत खुश हुए और उन्होंने उस बालक का नाम जरासंध रख दिया क्योंकि उसे जरा नाम की राक्षसी ने संधित (जोड़ा) किया था।

जिसके बाद ये बालक जरासनाध क नाम से जाना गया. जी हां राक्षसी का नाम जरा था |

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(Raja Jarasandh) जरासंध का वध किसने किया ?

भगवन कृष्ण ने बड़ी चतुराई से राजसूय यज्ञ की तैयारियों के तमाम पहलुओं की योजना बनाई अपने मित्र पांडवो के साथ |

वह जानते थे कि अगर इस काम में सबसे बड़ी अड़चन कहीं से आ सकती है तो वह महाराज जरासंध की तरफ से आ सकती है क्यूंकि महाराज सरासन्ध बहुत ही शक्तिशाली राजा था जिसे हराना नामुमकिन था ।

वह समझ रहे थे कि राजसूय यज्ञ की सफलता के लिए महाराज सरासन्ध मारना होगा।

लेकिन कृष्ण और पांडवो जानते थे अगर उन्होंने जरासंध के खिलाफ युद्ध छेड़ा तो दोनों ही तरफ की सेनाओं को भारी नुकसान उठाना होगा और जिससे समाज को बहुत ही हानि होगी |

भगवन कृष्ण ने सोचा इसके लिए सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि महाराज जरासंध को मल्लयुद्ध में ललकार उसे वहीं खत्म कर दिया जाए और साडी झंझट से निपटारा मिल जायेगा |

जरासंध एक महान मल्ल योद्धा भी था और उसके पास मल्ल योद्धाओं की एक पूरी फ़ौज थी जिसको हराना तो दूर की बात थी शत्रु उनके निकट भी नहीं जाती थे।

उस समय में मल्ल युद्ध एक ऐसी कला था, जो सिर्फ आपसी द्वंद्व या कुश्ती तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उसमें दिव्य आध्यात्मिक संभावनाएं भी छिपी होती थीं। दिव्या शक्ति से भरपूर उनकी तीर कमान थी |

महाराज जरासंध (Raja Jarasandh) ने भगवान श्रीकृष्ण से राजा कंस वध का प्रतिशोध लेने के लिए उसने 17 बार मथुरा पर चढ़ाई की, लेकिन हर बार उसे बहुत बड़ी तरह से असफल होना पड़ा भगवन कृष्ण को ।

जरासंध के भय से अनेक राजा अपने राज्य छोड़ कर दूसरे प्रांतो में भागना पड़ा |

शिशुपाल जरासंध का सेनापति था और साथ में वो बहुत ही बुद्धिमान और पराकर्मी भी था।

chandravanshi raja jarasandh
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महाराज जरासंध भगवान शंकर का परम भक्त था। उन्होंने अपने पराक्रम से 86 राजाओं को बंदी बना लिया था और गुमनाम पहाड़ी तहखानों में बंद कर दिया थ।

जरासंध 100 को बंदी बनाकर उनकी भगवन शिव को बलि देना चाहता था, जिससे कि वह चक्रवर्ती सम्राट बन सके।

महराज जरासंध की ये इच्क्षा भगवन कृष्ण और पांडवो को कहलाने लगी|

और ऐसी कारन से मगध महाराज जरासंध का वध करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवो के साथ मिलकर योजना बनाई।

योजना के अनुसार श्रीकृष्ण, भीम व अर्जुन ब्राह्मण का वेष बनाकर जरासंध के पास छल से गए और उसे कुश्ती के लिए अखाडा में ललकारा। महाराज जरासंध समझ गया कि ये ब्राह्मण नहीं है ये बहुरुपिया भगवन कृष्णा और उनके साथी पांडवो है ।

महाराज जरासंध ने पहले चेतवानी दी और उनके कहने पर भगवन श्रीकृष्ण ने अपना वास्तविक परिचय दिया।

महाराज जरासंध ने भीम से कुश्ती लड़ने का निश्चय किया और सत्य ये है की इस पृथ्वी पर ऐसा कोई नहीं था जो मगध महाराज जरासंध को पराजित कर सके ।

राजा जरासंध (Raja Jarasandh) और भीम का युद्ध कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से 13 दिन तक लगातार चलता रहा और लोगो को लगा ये कभी न ख़त्म होने वाली युद्ध है ।

चौदहवें दिन भीम ने श्रीकृष्ण का इशारा समझ कर जरासंध के शरीर के दो टुकड़े कर दिए और दो दिशावओ में फेक दिया|

शरीर दुबरा न जुड़ने पर महाराज जरासंध की मिर्तु हो गए।

(Raja Jarasandh) जरासंध का अखाड़ा

मगध महराज जरासंध के अखाड़े की सबसे ख़ास बात है की यहां मौजूद मिट्टी, जो उजले रंग की है और ये याद दिलाती है महाभारत और चंद्रवंशी रवानी/ कहर क्षत्रिओं का वीरताki कहानिया ।

प्राचीन भारतीय महाकाव्य महाभारत के अनुसार , भीम और और जरासंध में 18 दिनों तक भयानक युद्ध हुआ था। जिस अखाड़े में दोनों वीर के बीच युद्ध हुआ वह आज भी बिहार के के राजगीर में मौजूद है।

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मुझे उम्मीद है कि इस गाइड ने आपको दिखाया कि जरासंध की कहानी (इतिहास) क्या है।

और अब मैं आपसे पूछना चाहता हूं।

क्या आपने जरासंध की कहानी कुछ नया सीखा ?

या हो सकता है कि आपका कोई सवाल हो।

किसी भी तरह से, अभी नीचे एक टिप्पणी छोड़ दें।

मैं इस ब्लॉग में आपके उत्तर का उल्लेख करूंगा।

जय जरासंध 🙂

💪 सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं चंद्रवंशी समाज नहीं मिटने दूंगा, मैं चंद्रवंशी सर नहीं झुकने दूंगा! 💪
– निशांत चंद्रवंशी

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महराज जरासंध की कहानी [ जन्म और मृत्यु का सत्य ]
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महराज जरासंध की कहानी [ जन्म और मृत्यु का सत्य ]
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महराज जरासंध की कहानी [ जन्म, मृत्यु और Jarasandh akhada का सत्य ] King of Chandravanshi Samaj.
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United Chandravanshi Association UCA | संयुक्त चंद्रवंशी महासंघ
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