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🥇जरासंध जयंती कब होती है? ज्योष्ठोत्थान क्या है?

जरासंध जयंती कब होती है? ज्योष्ठोत्थान क्या है?

कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के एकादशी को जेठान के रूप में मनाया जाने वाला पर्व है। यह बिहार में बडे़ उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन ईख (गन्ना) की खरीदारी जमकर होती है। जेठान के दिन मुख्य रूप से ईख को देवी-देवताओं पर चढ़ाया जाता है और गन्ना चुसने की परम्परा होती है। इस दिन भारत के अलग-अलग राज्यों में एकादशी भी मनाया जाता है। लेकिन बिहार में इस दिन जेठान के रूप में धूम रहता है। जेठान पर्व के पीछे कथा इस प्रकार है-

मगध की राजधानी राजगृह में महाराजा वृहद्रथ नाम के एक महाप्रतापी तथा धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। जिनका विवाह काशी नरेश की दो सुन्दर सुशील कन्याओं से हुआ था। महाराज वृहद्रथ ने यह वचन दिया था कि वह अपनी दोनों पत्नियों से बिना भेदभाव के समान रूप से लगाव रखेंगे। लेकिन वृद्धावस्था तक उनकी कोई संतान नहीं हुई।

संतान के और उत्तराधिकारी के शोक के कारण राजा अपना राजपाठ त्याग कर सन्यास लेने का विचार लेकर जंगल की ओर चल दिये। जंगल में राजा बृहद्रथ महात्मा चण्डकौशिक के आश्रम में उनका शिष्य बनने के उद्देश्य से पहुँचे।

राजा ने पूरी श्रद्धा से महात्मा की सेवा की। राजा की सेवा से प्रसन्न होकर महात्मा चण्डकौशिक ने शिव का ध्यान कर एक आम्र फल दिया। राजा बडे आश्चर्यचकित हुए क्योंकि उन दिनों आम का मौसम नहीं था।

महात्मा ने फल देते हुए कहा कि ये फल अपनी पत्नी को खिला देना, इससे तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी। राजा अपने राज्य लौटकर सारी बातें रानियों को सुनाई और फल को आधा-आधा काटकर अपनी दोनों पत्नियों को खिला दिया।

जरासंध जयंती कब होती है ?

प्रत्येक वर्ष कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी ( जेठान) को जरासंध की जयंती मनाई जाती है। इसे राष्ट्रीय मगध दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। 2016 में जरासंध की 5219वीं जयंती, 2019 में 5222 वीं जयंती और 2020 में 5223 वीं जयंती मनायी गई।

समय आने पर दोनों रानियों के गर्भ से शिशु के शरीर का आधा-आधा भाग पैदा हुआ। अशुभ और व्यर्थ समझकर राजा ने टुकडे को जंगल में फेंकने का आदेश दे दिया। 

भगवान शिव के वरदान को निष्फल होता देख माँ पार्वती को दुख हुआ और उन्होंने अपना 85वां अवतार माता जरादेवी के रूप में लेकर वन में प्रकट हुई। बच्चें को जंगल में रखकर जब दासियां जाने लगी तब जरामाता उपस्थित होकर दासियों को ठहरने का अनुरोध की।

माँ जरामाता ने दोनों टुकड़ों को हाथ में लेकर अराध्य देव भगवान शंकर की अराधना करते हुए दोनों टुकड़े को आपस में जोड़ दी और बच्चें की कमर में लोहे की एक कील दे दी। टुकड़े आपस में जुडते ही बच्चा किलकारियाँ करने लगा।

जरामाता ने बालक को दासियों को सौंपते हुए राजमहल में लौट जाने को कहा। दासियां जानती थी कि उनकी बात कोई नहीं मानेगा इसलिए सभी ने अनुरोध किया कि वे खुद चलकर बच्चे को सौंपे।

माता ने उचित जानकर राजमहल पहुँची और राजा को बच्चा सौंपते हुए कही- राजन, यह आपका ही संतान है, मैंने अपने यश से इसे जोड़ दिया है, अब यह एक असाधारण और तेजस्वी बालक होगा। माता ने अपना परिचय वनदेवी के रूप में बताया।

माता जरादेवी राजा से इजाजत लेते हुए वहाँ से जाने की बात कही, तब राजा और उनकी रानियों ने बहुत अनुरोध किया कि वे महल में ही रह जाएं ताकि राजा और रानियाँ उनकी सेवा में अपना जीवन समर्पण कर सकें।

लेकिन जरादेवी ने अपनी जिम्मेदारियों की बात कहते हुए राजा को यह दिलासा दी कि वह समय-समय पर आकर बच्चें से मिलती रहेगी। यह कहकर देवी वापस जंगल में चली गयी। आज जरामाता को जरैयादेवी, बन्दादेवी या वनदेवी के नाम से भी जानी जाती है।

जरासंध जयंती

राजा वृहद्रथ ने कहा कि आपके परोपकार और यश से ही मेरे पुत्र का पुनर्जन्म हुआ है इसलिए मैं अपने संतान का नाम आपके नाम पर ही रखूंगा। चूंकि जरा माता के द्वारा जोड़ा (संध) किया गया था इसलिए बालक का नाम जरासंध रखा गया।

और यह घोषणा किया गया कि जरासंध का जन्मदिवस पर पूरे मगध तथा वृहद्रथ के सम्पूर्ण राज्य में इसे पर्व के रूप में धूमधाम से मनाया जाएगा। राजपुरोहितों के द्वारा इस दिन को और इस पर्व को “ज्योष्ठोत्थान” का नाम दिया गया।

इस दिन जरामाता को वनदेवी के रूप में पुजा जाने लगा। इसी का अपभ्रंश है जेठान। इस दिन लोग ईख व अन्य फलों की पूजा पाठ करते हैं।

प्रजा जरासंध महाराज को जरासंधेश्वर कहा करती थी। वायु पुराण के “चतुर्थ राजगृह महामात्य” में ऐसा अंकित है कि “जरासंध के समान आज तक संसार में कोई धर्मात्मा राजा नहीं हुआ।”

When is Jarasandha Jayanti? What is Jyothishothan?

Kartik month is the festival celebrated on the Ekadashi of Shukla Paksha as Jethan. It is celebrated with great enthusiasm in Bihar. On this day, shopping of sugarcane (sugarcane) is fierce. On the day of Jethan, mainly the reed is offered to the gods and goddesses and there is a tradition of licking sugarcane. Ekadashi is also celebrated on this day in different states of India. But in Bihar, this day is celebrated as Jethan. The story behind Jethan festival is as follows-

In the Rajgriha, the capital of Magadha, a great and righteous king named Maharaja Vrhadrath ruled. He was married to two beautiful beautiful girls of Kashi Naresh. Maharaja Vrhadratha promised that he would equally love his two wives without discrimination. But he did not have any children till old age.

Due to the mourning of the offspring and the heir, the king gave up his kingdom and went towards the forest with the idea of ​​retiring. In the forest, King Brihadratha reached the ashram of Mahatma Chandkaushik with the aim of becoming his disciple.

The king served the Mahatma with full devotion. Pleased with the service of the king, Mahatma Chandkaushik gave a mango fruit after meditating on Shiva. Raja was very surprised as there was no mango season in those days.

Giving fruit, Mahatma said that feed this fruit to your wife, you will get children from it. The king returned to his kingdom and narrated the whole thing to the queens and cut the fruit in half and fed it to his two wives.

When is Jarasandha Jayanti?

The Ekadashi (Jethan) of Kartik Shukla Paksha is celebrated every year on the birth anniversary of Jarasandha. It is also celebrated as National Magadha Day. Jarasandha’s 5219th birth anniversary was celebrated in 2016, 5222nd birth anniversary in 2019 and 5223th birth anniversary in 2020.

In due course, half of the baby’s body was born from the womb of both the queens. The king, considering it inauspicious and meaningless, ordered the tukde to be thrown into the forest.

Mother Parvati was saddened to see the boon of Lord Shiva unfruitful and she appeared in the forest carrying her 85th avatar as Mata Jaradevi. After placing the children in the forest, when the maidens started going, Jaramata appeared and requested the maidens to stay.

Mother Jaramata took both the pieces in her hand and worshiped Lord Arya Shankar and joined the two pieces together and gave an iron nail to the waist of the children. As soon as the pieces were joined together, the child started to kill.

Zaramata entrusts the child to the maidens and asks them to return to the palace. The maids knew that no one would listen to them, so everyone requested that they themselves walk and hand over the child.

Mother, having considered it appropriate, reached the palace and handed over the child to the king and said – Rajan, this is your child, I have added it to my fame, now it will be an extraordinary and stunning child. Mata introduced herself as Vanadevi.

Mother Jaradevi took permission from the king and asked him to leave, then the king and his queens very much requested that they stay in the palace so that the king and the queens could surrender their lives in his service.

But while speaking of her responsibilities, Jaradevi comforted the king that he would come and meet the children from time to time. Saying this, the goddess went back to the forest. Today Jaramata is also known as Jarayadevi, Bandadevi or Vanadevi.

Jarasandha jayanti

King Vrhadrath said that due to your benevolence and fame, my son has been reborn, so I will name my child after you. Since the couple was married by Jara Mata, the child was named Jarasandha.

And it was announced that on the birthday of Jarasandha, it will be celebrated with great pomp as a festival in the whole state of Magadha and Vrhadrath. This day and this festival was given the name of “Jyotishothan” by the Rajpurohitas.

On this day Jaramata came to be worshiped as Vanadevi. The abortion of this is Jethan. On this day people worship worship of reed and other fruits.

Praja Jarasandha Maharaj used to be called Jarasandeshwar. In the “Fourth Rajagriha Mahamatya” of the Vayu Purana, it is mentioned that “Like Jarasandha, till date no religious king has been born in the world.”

Researcher – Amit Ranjan chandravanshi

Publisher –  Nishant chandravanshi

 

 

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