चंद्रवंशी की पुकार – कविता 🥇Chandravanshi Ki Pukar – Poem🥇

चंद्रवंशी की पुकार – कविता [ Chandravanshi Ki Pukar – Poem ]

महाराजा बृहद्रथ की जान हो तुम|
गदाधर जरासंध की संतान हो तुम|
राजगृह थी चंद्रवंशी की राजधानी |
ययाति नहुष की तुम हो निशानी |
निकलते रण में तो कपंती जमीन थी|
नहीं आप में वीरता की कमी थी |
ववंदर में विधनो के डट जाते थे तुम |
अपनी शान शौकत पर मिट जाते थे तुम|
बड़े वीर थे तुम बड़े नामवार थे |
मानवता सचाई की पैगम्बर थे |
शरण में जो आया अभयदान दी है |
तवारीखों में अंकित अमर नाम की है |
मगर यह बताओ की तुम आज क्या हो|
ज़माने में तुम किस मरज की दवा हो|
बहुत सोये निद्रा में होश तुम अब तो सम्भालो |
डूबती कौमी किश्ती किनारे लगा लो |
तभी अपने वंशज का उधर होगा|
यह बेड़ा भॅवर से तभी पार होगा |
सत्यनाम तेरा अमर नाम होगा |
जो जाती की सेवा में बलिदान होगा |

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🥇सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं चंद्रवंशी समाज नहीं मिटने दूंगा,
मैं चंद्रवंशी  सर नहीं झुकने दूंगा! 🥇 – निशांत चन्द्रवंशी

This Chandravanshi Poem is presented by Nishant Chandravanshi founder of DigiManako & United Chandravanshi Association| UCA.

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